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पुस्तक समीक्षा : वर्तमान साहित्यिक परिवेश में विरल हैं ‘अकथ का आकाश’ जैसी कालजयी कृतियाँ

(राजकुमार अंजुम)

मुझे यह कहने में किंचित भी संकोच नहीं कि आलोचना साहित्य का भी उतना ही महत्व होता है, जितना मूल सृजन का होता है। इससे भी बढक़र मैं यह कहना चाहूँगा कि आलोचना का कार्य सस्ते साहित्य के इस पतनशील दौर में मूल लेखन से भी अधिक दुरूह है। मूल साहित्य को समझने-बूझने के उपरान्त एक अच्छा और सच्चा आलोचक रचना या सृजन के सैद्धान्तिक, व्यावहारिक और भावात्मक पक्ष को केन्द्रित करते हुये अपनी परिधियों को गढ़ता है। ‘अकथ का आकाश’ के सृजक मिथलेश शरण चौबे ने भी यही किया है। उनकी यह पुस्तक हाथ में आते ही मेरा मन इसे आद्योपान्त पढऩे के लिये यूँ ही आतुर नहीं हो उठा। इसकी विषय वस्तु और कथ्य का चयन ही इतने सारगर्भित तरीके से किया गया है कि किसी भी साहित्यिक समझ रखने वाले का मन विभोर हो उठेगा।

विशेषकर देश के रज़ा फाउण्डेशन के लिये लिखे गये श्रेष्ठतम् विचारों, आलेखों व समीक्षाओं पर केन्द्रित पुस्तक में जो कुछ भी समाहित् है, वह लेखक की उच्च साहित्यिक समझ-बूझ व विचारों का परिचायक है। कभी-कभी किसी कवि या लेखक की लेखनी में वह जादू समाहित् होता है कि पढऩे वाला कथ्य के भाव-प्रवाह और आनन्दातिरेक में बहते हुये यह भूल ही जाता है कि वह पढ़ क्या रहा है। उसके लिये इतना ही काफी होता है कि वह जो भी पढ़ रहा है, उसमें मन को आनन्दित् और आल्हादित् करने का गुण समाहित है और उसकी जानकारियों में भी इज़ाफा होना तय है। ललित कलाओं के जानकारों का कहना है कि साहित्य और संगीत समेत प्रत्येक ललित कला का मूल गुण यह भी होना चाहिये कि वह कला रस प्रेमी के मन को आल्हादित भी करे। इस दृष्टि से भी ‘अकथ का आकाश’ कृति सारे तक़ाज़ों को पूरा करती है।

मध्य प्रदेश के सागर जि़ले से ताल्लुक रखने वाले मिथलेश शरण चौबे का नाम साहित्य जगत में अब ऐसा अंजाना भी नहीं है। इससे पूर्व वह अपने कविता संग्रह ‘लौटने के लिये जाना’ तथा आलोचना कृति ‘कुँवर नारायन का रचना संसार’ के माध्यम से पर्याप्त ख्याति अर्जित कर चुके हैं। इसके अलावा मशहूर उपन्यासकार ‘फणीश्वर नाथ रेणु के उद्धरण’ और अनिल वाजपेयी की रचनाओं के चयन ‘फ़ैयाज़ खाँ जिनके मौसिया थे’ ने भी उन्हें साहित्याकाश पर चमकने का मौक़ा दिया है। इन दोनों ही कृतियों पर देश भर के कई विश्वविद्यालयों और साहित्यिक मंचों पर सेमिनार और कार्यशालाओं के आयोजन किये जा चुके हैं और यह कार्य अनवरत जारी है। कई सरकारी-गैर सरकारी पुरस्कारों से नवाज़े जा चुके मिथलेश शरण सागर के ही महाविद्यालय में अध्यापन करते हुये निरन्तर रचनाशीलता में तल्लीन रहते हैं। अध्यापन उनका शग़ल है और साहित्य सृजन उनका जीवन।

‘अकथ का आकाश’ कृति पर ज्योतिष जोशी जैसे विद्वान ने भूमिका लिखी है, जिनके बारे में कहा जाता है कि वह किसी रचनाकार के लिये इस रूप में सहज-सुलभ कभी नहीं होते। ‘अकथ का आकाश’ को पढऩे वालों की आसानी के लिये लेखक ने चार खण्डों-विलोक, विवक्षा, विवेच्य और विवृत में विभाजित किया है। एक उम्दा आलोचक का श्रेष्ठ गुण यह भी है कि उसकी आलोचना तात्कालिक टिप्पणियों तक सीमित न रहे, वरन वह मूल रचनाओं पर अपनी लेखनी की छाप अंकित करने में भी सक्षम हो। नि:सन्देह आलोचना का सरोकार किसी मूल रचना, आलेख या विचार के प्रति आलोचक की अस्वीकृति और अभिव्यक्ति दोनों में समाहित होती है, लेकिन अच्छी आलोचना वही है, जो मूल रचना या कृति में चार चाँद लगाने का कार्य कर सके। मिथलेश जी ने यही कार्य बड़ी खूबी के साथ किया है। कई बार तो पढ़ते समय यह पता ही नहीं चल पाता कि कहाँ मूल रचना समाप्त हुयी और कहाँ से आलोचक की लेखनी का आविर्भाव हुआ। मिथलेश जी ने प्रत्येक रचना-चाहे वह कविता, कहानी, उपन्यास या आलोचना किसी भी रूप में हो, के तत्व का न केवल गहन निरीक्षण किया है, अपितु उन रचनाओं तथा विचारों के अन्त:स्थल में उतरकर उनका समीचीन परीक्षण भी किया है।

कृति का पहला खण्ड-‘विलोक’ महात्मा गाँधी पर केन्द्रित है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में गाँधी के विचारों की प्रासंगिकता, गाँधी-मूल्य की अनिवार्यता आदि पर आधारित आलेखों पर लेखकीय टिप्पणियाँ बहुत कुछ सोचने पर विवश करती हैं। ‘विवक्षा’ खण्ड कविताओं पर आधारित है, जिसमें अज्ञेय, मुकुन्द लाठ, कमलेश, उदयन वाजपेयी और ध्रुव शुक्ल जैसे शीर्षस्थ रचनाकारों के सृजन पर विचारों का आदान-प्रदान किया गया है। ‘विवेच्य’ खण्ड में कहानियों पर बात की गयी है, जिसमें निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती, जयशंकर, आनन्द हर्षुल आदि की बेहद चर्चित कहानियों पर समीक्षात्मक आलोचनायें समाहित हैं। ‘विवृत’ खण्ड खालिस आलोचनाओं का खण्ड है, जिसमें उर्दू के मूर्धन्य विद्वान व आलोचक शम्सुर्रहमान फारुकी, उदयन वाजपेयी, कमलेश, संगीता गुँदेचा, अनुपम मिश्र, विष्णु नागर की कृतियों व रचनाओं के अलावा प्रख्यात संगीतज्ञ विलायत खाँ साहब की आत्मकथा पर सारगर्भित समीक्षाओं को शामिल किया गया है। लेखक ने प्राक्कथन में स्वयं स्पष्ट कर दिया है कि पुस्तक शायद अस्तित्व में कभी न आ पाती, यदि अग्रज आनन्द चौबे का सम्पादकीय मार्गदर्शन उन्हें न मिला होता। आनन्द चौबे झाँसी के स्वास्थ्य विभाग में बड़े अधिकारी होने के साथ ही स्वयं एक समर्थ कवि व लेखक हैं। कुल मिलाकर इतना ही कहूँगा कि आलोचनाओं और समालोचनाओं पर ऐसी स्तरीय कृतियाँ पाठकों को विरले ही नसीब हो पाती हैं, सो इसके पठन-पाठन के मोह का संवरण एक बेहतरीन कृति के बहुरसों से वंचित होने जैसा दुर्भाग्यपूर्ण कृत्य होगा।
प्रकाशक द्वारा पाठकों के लिये यह पुस्तक अमेज़न और फ्लिपकॉर्ट के ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर सहज-सुलभ करायी गयी है।

पुस्तक का नाम- “अकथ का आकाश”
लेखक- मिथलेश शरण चौबे
पृष्ठ संख्या-196,
मूल्य : रुपया 300 मात्र, प्रकाशक-विद्या विहार प्रकाशन (प्रभात प्रकाशन समूह), अंसारी रोड, दिल्ली।
समीक्षा: राजकुमार ‘अंजुम’

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